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Thursday, September 13, 2012

नदियां कभी वापस नही आती

नदियां कभी वापस नही आती-
-कृष्ण कुमार मिश्र

डेली न्यूज एक्टीविस्ट अखबार के संपादकीय पृष्ठ पर 10 सितम्बर 2012 को प्रकाशित लेख

अखबार के लिंक पर जाने के लिए यहां क्लिक करे!

Friday, August 12, 2011

फ़ूल जो कैद थे रईशों के गरूर की चारदीवारी में?

मैनहन गाँव - फ़ुलवारियों की एक कथा-

अतीत से वर्तमान तक.....

जनसत्ता अखबार में "फ़ूलों का आँगन" शीर्षक के साथ 9 अगस्त 2011 को संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित मेरा लेख जो फ़ूलों के सांस्कृतिक महत्व के अतरिक्त आम-जनमानस में फ़ुलवारियों के प्रति विरक्तता पर आधारित है, आखिर वे क्यों दूर रहे पुष्पों से और आज भी क्यों महरूम है फ़ूलों और उनकी मदमाती सुगन्ध से...   ये लेख जंगल कथा ब्लॉग से लिया गया है।...कृष्ण कुमार मिश्र


Sunday, July 3, 2011

यहाँ बाढ़ आती है हर साल त्योहार की तरह !

3 जुलाई 2011 को हिन्दुस्तान दैनिक बरेली संस्करण के मुख्य पृष्ठ पर प्राकाशित आलेख

Wednesday, February 9, 2011

बंजर जमीनों की निगेहबानी कौन करे ?

बंजर जमीनों की निगेहबानी कौन करे ? छत्तीसगढ़ से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका इतवारी अखबार (6 फ़रवरी 20011) में प्रकाशित लेख:

इतवारी अखबार, 6 फ़रवरी 2011, पृष्ठ संख्या 26








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कृष्ण कुमार मिश्र
77, कैनाल रोड, शिव कालोनी
लखीमपुर खीरी-262701
फ़ोन- 09451925997

Tuesday, February 8, 2011

टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह

छत्तीसगढ़ रायपुर से प्रकाशित उदन्ती मासिक पत्रिका (जनवरी 2011) में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह पर एक आलेख:








बिली अर्जन सिंह (15/08/1917-01/01/2010) की प्रथम पूर्ण्यतिथि पर उन्हे भावभीनी श्रंद्धाजली ।

कृष्ण कुमार मिश्र
77, कैनाल रोड, शिव कालोनी
लखीमपुर खीरी-262701
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Sunday, January 10, 2010

...........जब सुहेली भी ठहरी नज़र आई

हिन्दुस्तान में ६ जनवरी २०१० को प्रकाशित श्रद्धाजंली।

पद्म भूषण कुँवर बिली अर्जन सिंह(१५ अगस्त १९१७-०१ जनवरी २०१०)






कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन
भारत

Friday, January 8, 2010

मीरा-बलराम सिंह पुरस्कार


मेरा यह लेख १५ अक्टूबर सन २००६ में दैनिक हिन्दुस्तान लखनऊ में प्रकाशित हुआ।


पद्म श्री बिली अर्जन सिंह ने अपने छोटे भाई बलराम सिंह व उनकी पत्नी मीरा बलराम सिंह के नाम पर एक पुरस्कार की शुरूवात की थी। यह पुरस्कार प्रत्येक वर्ष  पर्यावरण व वन्य-जीवन के संरक्षण में अहम भूमिका निभाने वाले सरकारी व गैर-सरकारी व्यक्तियों व संस्थाओं को दिया जाता है।
यहां यह बता देना जरूरी हो जाता है कि बलराम सिंह ने एक बैश्विक कार कम्पनी के उच्च पद को त्याग कर टाइगर हावेन में बिली के साथ मिलकर वन्य-जीवों के लिए स्मरणीय कार्य किए और उनकी पत्नी मीरा बलराम सिंह ने उनके कार्यों को बलराम सिंह के बाद भी जारी रखा। सन २००७ में मीरा बलराम सिंह का भी निधन दुबई में हुआ। जहां वह अपने बेटे के साथ रहती थी।
मीरा बलराम सिंह ने अपने पति की मृत्यु के बाद बिली की पुस्तके टाइप करने में मदद करना और टाइगर हावेन की साज-सज्जा का खयाल रखना उनके प्रिय कार्यों में था। मीरा जी का टाइगर हावेन में क्रिसमस पार्टी का आयोजन काफ़ी लोकप्रिय था उनके मित्रों और आस-पास के लोगों में।
कुँवर बिली अर्जन सिंह के पश्चात अब इस पुरस्कार की गरिमा और इसका वितरण जारी रहेगा या यह पुरस्कार भी अपने प्रणेता के साथ अपना अस्तित्व खो देगा ये आने वाला समय बतायेगा।

कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन-भारत