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Saturday, February 27, 2010

मुश्किल में बाघ- जनसत्ता संपादकीय

फ़रवरी २७, २०१० को जनसत्ता दैनिक के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित दुधवा लाइव का यह लेख, बाघों और उनके आवासों के विषय पर आधारित है।---कृष्ण कुमार मिश्र

Sunday, January 10, 2010

...........जब सुहेली भी ठहरी नज़र आई

हिन्दुस्तान में ६ जनवरी २०१० को प्रकाशित श्रद्धाजंली।

पद्म भूषण कुँवर बिली अर्जन सिंह(१५ अगस्त १९१७-०१ जनवरी २०१०)






कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन
भारत

एक आनरेरी टाइगर का जाना

कुँवर बिली अर्जन सिंह जिन्होंने भारत में टाइगर संरक्षण की शुरुवात की और दुधवा राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना करवाई। और दुनिया में पहली बार बाघ और तेन्दुओं को पुनर्वासित करने का सफ़ल प्रयोग किया। ऐसी महान विभूति की हमारे मध्य से अनुपस्थित, महान दुख और रिक्तता का एहसास करायेंगा, जब-जब इन खूबसूरत जीवों पर अत्याचार होगा।
इस वैश्विक व्यक्तित्व को मेरी भाव-भीनी श्रद्धाजंली।
अमर उजाला में प्रकाशित ये श्रद्धाजंली की एक कतरन पोस्ट कर रहा हूं, इस आशा के साथ कि आप सब भी वाकिफ़ होगे धरती के उस महानायक से जो अब हमें अलविदा कह चुका है।




कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन
भारत


Wednesday, December 30, 2009

क्या नौ गज़ के आदमी के बारे में सुना है आप ने!




नौ गज़ यानी नौ यार्ड, लम्बाई की यह मापन य़ुनिट यार्ड का उर्दू में गज़ है जो कि भारतीय उपमहाद्वीप में खूब प्रचलित रही और आज़ भी ग्रामीण क्षेत्रों में यह मापन इकाई जनमानस में प्रचलित है।
हां तो अब यदि हम नौ गज़ या नौ यार्ड को मीटर में तब्दील करे तो नौ गज़= 8.2296 मीटर!
मानव इतिहास व विज्ञान में इतने लम्बे आदमी का कोई प्रमाण नही मिलता यदि मुझसे कोई चूक हो रही हो मानव विज्ञान के इतिहास के विषय में तो अवगत अवश्य कराइये गा।
खीरी जनपद के दुधवा टाइगर रिजर्व में घने जंगलों के मध्य एक मज़ार है जो आदमकद बिल्कुल नही है बल्कि आठ-नौ मीटर लम्बी है। तो फ़िर कौन है दफ़न इस कब्र में।

Tuesday, December 29, 2009

बदहाल होता एक एतिहासिक पुस्तकालय




31, जनवरी 2004 को सहारा समय में प्रकाशित

मेरा यह लेख 31,जनवरी सन 2004 को सहारा समय साप्ताहिक अखबार में प्रकाशित हुआ। इस लेख का श्रेय मै सुश्री पाल कार्टर को देता हूं जिन्होंने लन्दन से मुझे विलियम डगलस विलोबी के बारे में जानकारी प्राप्त करायी।
विलोबी सन1920 ईस्वी में डिप्टी कमिश्नर थे जिला खेरी के, इनकी हत्या 26 अगस्त सन 1920 ई0 को कर दी गयी।
कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन-खीरी

Monday, December 28, 2009

ऐसा है ग्रामीणों का पक्षी प्रेम


Posted by Picasa३ अगस्त सन २००३ में मेरा ये लेख सहारा समय साप्ताहिक अखबार में प्रकाशित हुआ। ये मेरे जनपद का अतुलनीय सामुदायिक पक्षी विहार है जिसे ग्रामीण संरक्षित करते हैं। - कृष्ण कुमार मिश्र

नुक़ूश-ए-कतरन

हिन्दी ब्लाग जगत में मेरा एक प्रयास, जिसमें मैं अपनी प्रकाशित कृतियों को इस वेब पेज पर इकठ्ठा करूगा।
यहां एक सवाल उत्पन्न हुआ कि आखिर इस जगह का नाम क्या होगा? सवाल तलाशने में मुझे ४८ घंटे लग गये! जो पहला जवाब आया वो था "चिफ़ुरियां" बूढ़े नीम के तने से छूटती चिफ़ुरियां जिन्होंने धरती के हर मौसम को जिया-झेला और फ़िर छूटने लगी, जीवन की डोर से,  जिसे विज्ञान अपने तरीके से परिभाषित करता है और अध्यात्म अपने तरीके से। वो नीम के शरीर का मृत अंश जिसे मेरे गांव में चिफ़ुरियां कहते थे यानी लकड़ी का पतला, छोटा और बेढ़ंगा टुकड़ा भी मानुष के त्वचा पर उग आई फ़ुन्सियों पर घिस कर लगाने के काम आता है और यह राम बाण हुआ करता था त्वचा रोगो के लिए। किन्तु अब न तो बूढ़े वृक्ष बचे है और न ही उनकी वों चिफ़ुरियां। अंग्रेजी के स्क्रैप की जगह यह शब्द बिल्कुल माकूल लगता है मुझे, कमेन्ट की जगह भी और अखबार की कतरन के लिए भी।
यहां एक दिक्कत आ गयी कि इस शब्द से हो सकता है तमाम लोग नावाकिफ़ हो। सो मैने अपने बेव पेज जो अखबार की कतरनों की तरह कपड़े की कतरनों से सुसज्जित है को देखकर पैबंद.........कतरन .....आदि-आदि, अब मैने सोचा कि चलिए इस अन्तर्जाल की खाली जगह को अपने लेखों की कतरनों से सजाया जाय, यानी पैबन्द्कारी की जाय और अब इसका नाम रखा "पैबन्द-ए-कतरन"।
किन्तु अभी भी मेरा अति घुमक्ड़ मन चकरघिन्नी लगा रहा था कि यार पैबन्द कोई अच्छी चीज नही, क्यों अन्तर्जाल की इस जगह को खराब करे पैबन्द यानी प्योंदें लगाकर.......!
तो मशविरा हुआ और मेरे एक बुजुर्ग मित्र सिद्दीकी साहब ने मुझे दो नाम सुझाए, अक्श-ए-कतरन और नुकूश-ए-कतरन।
मुझे नुकूश-ए-कतरन रास आया। अतंत: अब इस प्यारी-न्यारी अन्तर्जालीय स्थल का नाम नक़ूश-ए-कतरन है जो कि मुस्तकिल व मुकम्मल है।
अब मैं अपनी कतरनों से खूबसूरत नुक़ूश बनाता रहूंगा। निरन्तर...........अनवरत।