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Tuesday, December 29, 2009

गुलामी की यादे समेटे एक खण्डहर





12 मार्च, 2006 को दैनिक हिन्दुस्तान लखन्ऊ में मेरा यह एतिहासिक लेख प्रकाशित हुआ।



ये कुछ संस्मरण है मेरे अपने लोगों के जिनकी नज़र से देखा है॥ ये वो दौर था जब  कोई राजा नही था और न नवाब,   जो अंग्रेजों की नौकरी कराते थे। इन नौकरों को गोरों ने राजा, महाराजा, नवाब आदि के ख़िताब का एक रुक्का (कागज़) दे रखा था।
उस सेकंडरी शासक कैसे-कैसे जुल्म करते थे जनता से और कैसे रहमदलाली और चापलूसी करते थे गोरी चमड़ी का इसका बयांन तो नही करूंगा। किन्तु उनके उन रुतबों का और राज भय का जिक्र जरूर करूंगा, जिनके कारण जनता को कितनी तकलीफ़ उठानी पड़ती थी।
कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन-खीरी